समुद्र मंथन कथा – Samudhra Manthan Katha

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समुद्र मंथन कथा - Samudhra Manthan Katha

Samudhra Manthan Katha : समुद्र मंथन से निकले अमृत को भगवान विष्णु मोहिनी रूप में सभी देवताओं और असुरों में बराबर बाटने के लिए आते हैं। अमृत पीकर जब देवता और असुरों के बीच युध होता है तो राजा बलि की भी मृत्य हो जाती है। दैत्य गुरु शुक्राचार्य अपनी संजीवनी विद्या से सभी असुरों को पुनर जीवित कर देते हैं। 

धारावाहिक : श्रीकृष्ण रामानंद सागर कृत
कहानी :समुद्र मंथन कथा
संगीत :रवींद्र जैन
निर्देशकरामानंद सागर
शैलीपौराणिक कथा
मूल प्रसारण18 जुलाई 1993 – 5 अक्टूबर 1997
मूल चैनल :दूरदर्शन
छायांकन :अजित नाइक
निर्माता :रामानंद सागर, आनंद सागर, मोती सागर
संपादक :सुभाष सहगल
मूल भाषा :हिंदी (Hindi)

समुद्र मंथन कथा | भगवान विष्णु की वामन अवतार कथा

उसके पश्चात राजा बलि गुरु शुक्राचार्य के आदेश से 100 यज्ञ करते हैं ताकि इंद्र के स्वर्ग पर उनका हो सके। जब राजा बलि के 99 यज्ञ पूरे हो चुके थे तो उसके 100 यज्ञ पूरे ना होने पाए इसके लिए विष्णु भगवान वामन अवतार में राजा बलि की पास आते हैं और उनसे भिक्षा माँगते हैं। 

भगवान वामन की भिक्षा माँगने पर गुरु शुक्राचार्य राजा बाली के बताते हैं की ये भगवान विष्णु का रूप हैं जिन्होंने देवी अदिति की नभि से जनम लिया है ताकि तुमसे तुम्हारा सब कुछ तीन पग में तुमसे माँग सके। 

मार्कण्डेय ऋषि उनके सामने बैठे सभी ऋषियों को कथा सुनाना शुरू करते हैं की कैसे विष्णु जी ने माता लक्ष्मी को प्रकट किया और अपने अंदर से ब्रह्मा और शिव को प्रकट किया और फिर माता लक्ष्मी ने अपने दो रूपों सरस्वती और उमा को प्रकट किया। मार्कण्डेय ऋषि सभी को विष्णु जी के अवतारों की कथा भी सुनाते हैं जिसके कारण सृष्टि का निर्माण हुआ था।

देवताओं और असुरों में युद्ध चल रहा था जिसे समाप्त करने के लिए माता लक्ष्मी जी ने देव गुरु ब्रहस्पति को देवताओं और असुरों में संधि करा कर समुद्र मंथन कराने के लिए कहती हैं। देव गुरु इंद्र को लेकर असुर राज बलि के पास जाते हैं और उनसे कहते हैं की देवासुर संग्राम को रोक कर आपस में संधि कर लें लेकिन असुर राज बलि नहीं मानता और उनसे कहता है की मैं अपने गुरु शुक्राचार्य से इस पर वार्ता करके ही निर्णय लूँगा।

तो देव गुरु असुर गुरु शुक्राचार्य के पास जाते हैं। असुरों और देवताओं में संधि कराने के लिए महालक्ष्मी देवी सरस्वती को शुक्राचार्य के ह्रदय में निवास कर उनकी संधि कराने के लिए कहती हैं। शुक्राचार्य और ब्रहस्पति दोनों मिलकर देवताओं और असुरों में संधि करा देते हैं। ब्रहस्पति और शुक्राचार्य दोनों मिलकर देवताओं और असुरों के द्वारा समुद्र मंथन करने के लिए कहते हैं। असुर राज बलि समुद्र मंथन में मिलने वाले सभी वस्तुओं का बाँटने की बात करता है। शुक्राचार्य वस्तुओं को बाँटने के लिए महादेव से सलाह करने के लिए कहते हैं।

समुद्र मंथन | Samudr Manthan

Samudhra Manthan Katha : YouTube Video

असुर राज बलि इंद्र देव शुक्राचार्य और ब्रहस्पति महादेव के पास आते हैं और उनसे समुद्र मंथन करने में मार्ग दर्शन करने के लिए कहते हैं। महादेव उनसे कहते हैं की हिमालय पर्वतमाला से एक पर्वत मंदार पर्वत को मथानी और वासुकि को रस्सी के तौर पर इस्तेमाल करके समुद्र मंथन करने को कहते हैं।

असुर और देवता सगर मंथन शुरू कर देते हैं लेकिन मंदार पर्वत को स्थिर नहीं रख पाते इसके लिए माता लक्ष्मी विष्णु जी से कहती हैं की कछक रूप में पर्वत को स्थिर करने के लिए आधार दे कर समुद्र मंथन में मदद करे। विष्णु जी कछुआ रूप धारण कर लेते हैं और पर्वत को अपनी पीठ पर रख कर उसे आधार दे देते हैं। समुद्र मंथन शुरू हो जाता है और उसमें से काल कूट विष निकलता है जिसे महादेव आकर पाई जाते है और अपने कंठ में रोक लेते हैं।

भगवान शिव को नीलकंठ क्यों कहते हैं

महादेव के कंठ में विश को धारण करने के कारण महादेव को निलकंठ का नाम भी देते हैं समुद्र मंथन फिर से प्रारम्भ हो जाता है। समुद्र मंथन से अश्वों का राजा निकलता है और फिर समुद्र मंथन से ऐरावत निकलता है। कुछ समय बाद समुद्र मंथन से कोसतुब मणि निकलती है। देवता और असुर सभी एक एक करके वस्तुओं को अपने लिए रखने की बात करते हैं। समुद्र मंथन से कामधेनु गाय निकलती है और फिर कल्प वृक्ष निकलता है।

उसके बाद समुद्र मंथन से चिंतामणि निकलती है। इन सभी वस्तुओं के बाद लक्ष्मी माता अपने महालक्ष्मी रूप को समुद्र मंथन से अवतरित करती हैं। देवी देवता और असुर लक्ष्मी माता की आराधना करते हैं। असुर राज लक्ष्मी माता को देख कर उसे अपने अधीन कर अपने साथ असुर लोक में ले जाने की ज़िद्द करता है। लक्ष्मी माता उसे। मना कर देती है। असुर राज बलि लक्ष्मी माता को बंदी बनाने की कोशिश करता है परंतु बना नहीं पाता।

समुद्र मंथन की कथा | पौराणिक कथा और रहस्य – विष्णु पुराण 

असुर राज बलि ने माता लक्ष्मी को बंदी बनाने की कोशिश की तो लक्ष्मी माता ने उसके सभी असुरों को अपने अंदर समा लिया। शुक्राचार्य असुर राज बलि को समझाते हैं और उसे कहते हैं की माता लक्ष्मी से क्षमा माँग ले वो स्वयं शक्ति का रूप हैं। असुर राज बलि माता लक्ष्मी से क्षमा माँगता है तो माता लक्ष्मी सभी असुरों को मुक्त कर देती है। नारद मुनि जी देव गुरु ब्रहस्पति और शुक्राचार्य को कहते हैं की माता लक्ष्मी सिर्फ़ उन्हीं के पास रहेगी जो त्रिगुणातीत होगा देवी लक्ष्मी उन्हीं के पास रहेगी।

शुक्राचार्य और ब्रहस्पति यह पता लगाने के लिए ब्रह्म, विष्णु और महादेव के पास जाने की सोचते हैं की देखते हैं की कौन से देवता के साथ देवी लक्ष्मी का विवाह किया जा सकता है। शुक्राचार्य और ब्रहस्पति दोनों ब्रह्मा जी के पास जाते हैं और उन्हें चोर कह कर पुकारते हैं तो ब्रह्मा जी को क्रोध आ जाता है और वो उन दोनों पर शक्ति से प्रहार करते हैं नारद मुनि जी ब्रह्मा जी को ऐसा करने से रोक देते हैं और उन्हें बताते हैं की ये सब एक नाटक था।

शुक्राचार्य और ब्रहस्पति तो सिर्फ़ ये जानना चाहते थे की आप त्रिगुणातीत हैं या नहीं। ब्रह्मा जी उन्हें माफ़ आकर देते हैं और उन्हें बताते हैं की वो लक्ष्मी के पति नहीं बन सकते। इसके बाद शुक्राचार्य और ब्रहस्पति महादेव के पास भी जाते हैं और उनका भी अपमान कर उन्हें क्रोधित कर देते हैं। महादेव उनसे क्रोधित हो उन्हें भस्म करने ही वाले थे की नारद मुनि जी और ब्रह्मा जी महादेव को आकर रोक देते हैं। महादेव उन्हें बताते हैं की मैं त्रिगुणातीत नहीं हूँ क्योंकि मुझमें क्रोध निवास करता है। त्रिगुणातीत तो सिर्फ़ क्षीर सागर में निवास करने वाले विष्णु हैं।

श्रीकृष्णा, रामानंद सागर द्वारा निर्देशित एक भारतीय टेलीविजन धारावाहिक है। मूल रूप से इस श्रृंखला का दूरदर्शन पर साप्ताहिक प्रसारण किया जाता था। 

यह धारावाहिक कृष्ण के जीवन से सम्बंधित कहानियों पर आधारित है। गर्ग संहिता , पद्म पुराण , ब्रह्मवैवर्त पुराण अग्नि पुराण, हरिवंश पुराण , महाभारत , भागवत पुराण , भगवद्गीता आदि पर बना धारावाहिक है सीरियल की पटकथा, स्क्रिप्ट एवं काव्य में बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डॉ विष्णु विराट जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

इसे सर्वप्रथम दूरदर्शन के मेट्रो चैनल पर प्रसारित 1993 को किया गया था जो 1996 तक चला, 221 एपिसोड का यह धारावाहिक बाद में दूरदर्शन के डीडी नेशनल पर टेलीकास्ट हुआ, रामायण व महाभारत के बाद इसने टी आर पी के मामले में इसने दोनों धारावाहिकों को पीछे छोड़ दिया था

  • Produced – Ramanand Sagar / Subhash Sagar / Pren Sagar 
  • निर्माता – रामानन्द सागर / सुभाष सागर / प्रेम सागर 
  • Directed – Ramanand Sagar / Aanand Sagar / Moti Sagar 
  • निर्देशक – रामानन्द सागर / आनंद सागर / मोती सागर 
  • Chief Asst. Director – Yogee Yogindar 
  • मुख्य सहायक निर्देशक – योगी योगिंदर 
  • Asst. Directors – Rajendra Shukla / Sridhar Jetty / Jyoti Sagar 
  • सहायक निर्देशक – राजेंद्र शुक्ला / सरिधर जेटी / ज्योति सागर 
  • Screenplay & Dialogues – Ramanand Sagar 
  • पटकथा और संवाद – संगीत – रामानन्द सागर 
  • Camera – Avinash Satoskar 
  • कैमरा – अविनाश सतोसकर 
  • Music – Ravindra Jain 
  • संगीत – रविंद्र जैन 
  • Lyrics – Ramanand Sagar 
  • गीत – रामानन्द सागर

अंतिम बात :

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