प्रकृति के तीन गुण | सत्व,रजस,तमस | श्रीमद भगवदगीता | Sattva Rajas Tamas

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Sattva Rajas Tamas - प्रकृति के तीन गुण | सत्व,रजस,तमस

Sattva Rajas Tamas : प्रकृति के तीन गुण से ( सत्त्व , रजस् और तमस् ) सृष्टि की रचना हुई है । ये तीनों घटक सजीव-निर्जीव, स्थूल-सूक्ष्म वस्तुओं में विद्यमान रहते हैं । इन तीनों के बिना किसी वास्तविक पदार्थ का अस्तित्व संभव नहीं है। किसी भी पदार्थ में इन तीन गुणों के न्यूनाधिक प्रभाव के कारण उस का चरित्र निर्धारित होता है।

यह सत्त्व, रजस् और तमस् गुण व्यक्ति की ऊर्जा के अलावा और कुछ नहीं हैं। यह ऊर्जा निर्धारित करती हैं कि कोई भी व्यक्ति कैसे कार्य करता हे या कैसे व्यवहार करता है। ये ऊर्जा सकारात्मक, नकारात्मक और तटस्थ हो सकती हैं।

प्रकृति के तीन गुण जो हिंदू दर्शनशास्त्र में उल्लेखित होते हैं वे हैं सत्व (Sattva), रजस (Rajas), और तमस (Tamas)। ये गुण प्रकृति के विभिन्न आंशिकों में व्याप्त होते हैं और प्राकृतिक दुनिया के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित करते हैं।

कहानी :प्रकृति के तीन गुण : सत्व, रजस, तमस
शैली :आध्यात्मिक कहानी
सूत्र :पुराण
मूल भाषा :हिंदी

प्रकृति के तीन गुण : सत्व, रजस, तमस की परिभाषा | Sattva Rajas Tamas

प्रकृति अर्थात् क्या हे ? प्र = विशेष और कृति = किया गया। स्वाभाविक की गई चीज़ नहीं। लेकिन विभाव में जाकर, विशेष रूप से की गई चीज़, वही प्रकृति है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि वेद तीन गुणों से बाहर नहीं हैं, वेद तीन गुणों को ही प्रकाशित करते हैं

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्‌ ॥

भावार्थ : हे अर्जुन! सत्व, रजस, तमस – ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं॥

सत्व, रजस, और तमस तीनों गुण हैं जो हिंदू दर्शन और फिलॉसफी में प्रमुख भौतिक तत्वों को व्यक्त करते हैं। ये गुण संसार में भावनाओं, मानसिक स्थितियों, और प्रकृति के विभिन्न पहलुओं को वर्णित करने के लिए प्रयोग होते हैं। इन तीनों गुणों का प्रभाव हमारे विचारों, भावनाओं, कर्मों, और जीवन के प्रति हमारे उत्पन्न होने वाले प्रतिक्रियाओं पर होता है।

सत्व गुण की परिभाषा – sattva :

सत्वगुण का अर्थ “पवित्रता” तथा “ज्ञान” है। सत्व अर्थात अच्छे कर्मों की ओर मोड़ने वाला गुण खा हे | तीनों गुणों ( सत्त्व , रजस् और तमस् ) में से सर्वश्रेष्ठ गुण सत्त्व गुण हे सात्विक मनुष्य – किसी कर्म फल अथवा मान सम्मान की अपेक्षा अथवा स्वार्थ के बिना समाज की सेवा करना । 

सत्त्वगुण दैवी तत्त्व के सबसे निकट है । इसलिए सत्त्व प्रधान व्यक्ति के लक्षण हैं – प्रसन्नता, संतुष्टि, धैर्य, क्षमा करने की क्षमता, अध्यात्म के प्रति झुकाव । एक सात्विक व्यक्ति हमेशा वैश्विक कल्याण के निमित्त काम करता है। हमेशा मेहनती, सतर्क होता है । एक पवित्र जीवनयापन करता है। सच बोलता है और साहसी होता है।

जिस व्यक्ति में सात्विक गुण की मात्रा अधिक होती हे ऐसे सात्विक गुण या सत्त्वगुण वाले व्यक्ति बहुत ही दयालु, पवित्र, खुश, ज्ञानी, बुद्धिमान और सकारात्मक होते हैं। वे निष्पक्ष होते है। ऐसे व्यक्ति सही या गलत के बारे में बहुत विचारशील होते हैं। सत्व गुण वाले व्यक्ति श्रेष्ठ होते हे

सत्व (Sattva): सत्व गुण गुणों का प्रधान और पुरुषार्थशील गुण है। यह गुण प्रकृति के शुद्ध, शांत, सत्य, ज्ञान, ध्यान, संतुलन, उपासना, प्रेम, दया, स्वस्थ मनस्थिति और सत्यपरायणता को प्रभावित करता है। जब सत्व गुण प्रामाणिक होता है, तो मन, बुद्धि और आहार सुगमता से शुद्ध होते हैं और अध्यात्मिक उन्नति होती है।

रजस् गुण की परिभाषा – Rajas :

रजस् का अर्थ क्रिया तथा इच्छाएं है। राजसिक मनुष्य – स्वयं के लाभ तथा कार्यसिद्धि हेतु जीना । जो गति पदार्थ के निर्जीव और सजीव दोनों ही रूपों में देखने को मिलती वह रजस् के कारण देखने को मिलती है। निर्जीव पदार्थों में गति और गतिविधि, विकास और ह्रास रजस् का परिणाम हैं वहीं जीवित पदार्थों में क्रियात्मकता, गति की निरंतरता और पीड़ा रजस के परिणाम हैं। 

हम में से अधिकांश लोग रजस् यानि की रजोगुणी जीवन जीते हैं, व्यक्ति के व्यवहार और आचरण को देखकर यह बताया जा सकता है की उनमे कौनसा गुण अधिक हे | तमस जीवन से ऊपर की अवस्था का नाम है रजस | तीनों गुणों में से मध्यम गुण है रजस | राजसिक जीवन उस व्यक्ति की भांति होता है जिसके जीवन में सुख दुःख का संघर्ष अनवरत जारी रहते हे

रजस गुण वाले व्यक्ति को यह अहसास कई बार होता है की जीवन में अज्ञानता हे अँधेरा छाया हुआ है और वह यह भी जानता हे की उसे जीवन में तब तक आनंद नहीं मिल सकता जब तक वह इस अवस्था से बाहर न आ जाए | रजोगुण के प्रवृत्त होने पर मनुष्य में भोगो के प्रति आसक्ति बढती है । जिससे वह अधिक से अधिक भोगों को प्राप्त कर लेना चाहता है

रजस (Rajas): रजस गुण गतिशीलता, अभिलाषा, प्रवृत्ति, अधिकारशीलता, आवेश, उत्साह, आक्रामकता, क्रोध, आहार और निद्रा को प्रभावित करता है। यह गुण कार्यक्षमता, उत्पादन शक्ति, उत्साह, प्रतियोगिता, लोभ, कामना और संग्राम को बढ़ाता है।

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्‍गसमुद्भवम्‌ ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्‍गेन देहिनम्‌ ॥

भावार्थ : हे अर्जुन! रागरूप रजस गुण को कामना और आसक्ति से उत्पन्न जान। वह इस जीवात्मा को कर्मों और उनके फल के सम्बन्ध में बाँधता है

ध्यात्मिक ग्रन्थों जैसे की वेद पुराण भगवद गीता के अभ्यास से रजस गुण वाले व्यक्ति के लिए सत्व गुण में प्रवेश करना आसान हे तमस गुण वाले व्यक्ति की तुलना में

तमस् गुण की परिभाषा – Tamas :

तमस् का अर्थ अज्ञानता तथा निष्क्रियता है। तामसिक मनुष्य – दूसरों को अथवा समाज को हानि पहुंचाकर स्वयं का स्वार्थ सिद्ध करना | तम प्रधान व्यक्ति, आलसी, लोभी, सांसारिक इच्छाओं से आसक्त रहता है ।

तमस् गुण के प्रधान होने पर व्यक्ति को सत्य-असत्य का कुछ पता नहीं चलता, यानि वो अज्ञान के अंधकार (तम) में रहता है। यानि कौन सी बात उसके लिए अच्छी है वा कौन सी बुरी ये यथार्थ पता नहीं चलता और इस स्वभाव के व्यक्ति को ये जानने की जिज्ञासा भी नहीं होती।

मस (Tamas) गुण प्रकृति का तामसिक गुण है। यह गुण अज्ञान, अनचेतनता, अन्धकार, निद्रा, अलसता, मोह, अज्ञानता और निर्बुद्धि को प्रभावित करता है। तमस गुण के प्रभाव में होने पर मनुष्य उदासीनता, आलस्य, तमस्ता, और जड़ता की स्थिति में रहता है।

तमस गुण व्यक्ति को ज्ञान की अभाव, ध्यान की कमी, और आत्मिक विकास की अवस्था में बाधाएं डालता है। यह गुण तामसिक आहार, मनोरंजन, अशिक्षा, अध्यात्मिक अनदेखी, और अधिक निद्रा को बढ़ा सकता है।

तीन गुणों की भक्ति में, भूल पड़ो संसार ।
कहे कबीर निज नाम बिना, कैसे उतरे पार।।

अर्थात : प्राणी, इन तीन गुणों रजोगुण – ब्रह्माजी, सतोगुण – विष्णुजी, तमोगुण – शिवजी को ही सर्वश्रेष्ठ मानकर इनकी भक्ति करके दुखी हो रहे है । ब्रह्म (काल) तथा प्रकृति (दुर्गा) से उत्पन्न हुऐ है तथा यह तीनों नाशवान है

तमस गुण के प्रभाव से बचने के लिए, मनुष्य को सत्व और रजस गुण को विकसित करने की प्रयास करनी चाहिए। योग, मेधावी आहार, ध्यान, सेवा, सत्संग, और आध्यात्मिक साधनाओं का अभ्यास तमस गुण से परे उठने में मदद कर सकता है

FAQs For Sattva Rajas Tamas

  1. रजस गुण के लक्षण क्या हे ?

    जीवन में सब कुछ पाने की महत्वकांक्षा रखना और दुखों को छुपाने के लिए मनोरंजन के साधन ढूंढना रजस गुण के लक्षण है! रजोगुण के प्रवृत्त होने पर मनुष्य में भोगो के प्रति आसक्ति बढती है । जिससे वह अधिक से अधिक भोगों को प्राप्त कर लेना चाहता है

  2. सत्व गुण के लक्षण क्या हे ?

    सत्त्वगुण वाले व्यक्ति बहुत ही दयालु, पवित्र, खुश, ज्ञानी, बुद्धिमान और सकारात्मक होते हैं। वे निष्पक्ष होते है। ऐसे व्यक्ति सही या गलत के बारे में विचारशील होते हैं।

  3. तमस् गुण के लक्षण क्या हे ?

    तमस् गुण व्यक्ति को सत्य-असत्य का कुछ पता नहीं चलता यानि वह अज्ञान के अंधकार (तम) में रहता है | तमस् गुण वाला व्यक्ति, आलसी, लोभी, सांसारिक इच्छाओं से आसक्त रहता है ।

  4. प्रकृति के तीन गुण कौन से हैं

    प्रकृति के तीन गुण हैं – रजोगुण (रजस) , सतोगुण (सत्व) और तमोगुण (तमस)

अंतिम बात :

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