नवग्रह गायत्री मंत्र (Navagraha Gayatri Mantra) सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु—इन नौ ग्रहों से संबंधित प्रचलित गायत्री मंत्रों का संग्रह है।
भारतीय ज्योतिष परंपरा में नवग्रहों को विशेष महत्व दिया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रद्धापूर्वक नवग्रहों का स्मरण और मंत्र-जप आध्यात्मिक साधना का एक माध्यम माना जाता है।
इस लेख में सूर्य से केतु तक सभी 9 नवग्रह गायत्री मंत्र, उनका सरल अर्थ, पाठांतर और सामान्य जप-विधि दी गई है।
नवग्रह कौन-कौन से हैं?
भारतीय ज्योतिष परंपरा में नवग्रह इस प्रकार माने जाते हैं:
- सूर्य
- चन्द्र
- मंगल
- बुध
- गुरु
- शुक्र
- शनि
- राहु
- केतु
इनमें राहु और केतु को खगोलीय ग्रह की बजाय चन्द्र-पथ से संबंधित छाया ग्रह/गणितीय बिंदुओं के रूप में समझा जाता है।
1. सूर्य गायत्री मंत्र
सूर्य को प्रकाश और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
सूर्य गायत्री मंत्र
ॐ अश्वध्वजाय विद्महे पाशहस्ताय धीमहि।
तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्॥
सरल भावार्थ
हम अश्वध्वज वाले सूर्यदेव का ध्यान करते हैं, जिनके हाथ में पाश है। वे हमारी बुद्धि और चेतना को प्रेरित एवं प्रकाशित करें।
नोट: सूर्य गायत्री के कई अन्य पाठ भी प्रचलित हैं, जैसे “ॐ भास्कराय विद्महे दिवाकराय धीमहि…” आदि।
2. चन्द्र गायत्री मंत्र
चन्द्र को भारतीय परंपरा में शीतलता और मन से जोड़ा जाता है।
चन्द्र गायत्री मंत्र
ॐ पद्मध्वजाय विद्महे हेमरूपाय धीमहि।
तन्नः सोमः प्रचोदयात्॥
सरल भावार्थ
हम पद्मध्वज और स्वर्णिम स्वरूप वाले सोम का ध्यान करते हैं। वे हमारी बुद्धि को शुभ दिशा में प्रेरित करें।
3. मंगल गायत्री मंत्र
मंगल को भौम और अंगारक नामों से भी जाना जाता है।
मंगल गायत्री मंत्र
ॐ वीरध्वजाय विद्महे विघ्नहस्ताय धीमहि।
तन्नो भौमः प्रचोदयात्॥
सरल भावार्थ
हम वीरध्वज स्वरूप भौम का ध्यान करते हैं। मंगल हमारी बुद्धि को उचित दिशा में प्रेरित करें।
मंगल गायत्री का प्रचलित पाठांतर
मंगल गायत्री का यह स्वरूप भी बहुत प्रचलित है:
ॐ अंगारकाय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि।
तन्नो भौमः प्रचोदयात्॥
अलग-अलग पूजा-पद्धतियों में दोनों प्रकार के पाठ मिल सकते हैं।
4. बुध गायत्री मंत्र
बुध को ज्योतिष परंपरा में बुद्धि, वाणी और विवेक से संबंधित माना जाता है।
बुध गायत्री मंत्र
ॐ गजध्वजाय विद्महे शुकहस्ताय धीमहि।
तन्नो बुधः प्रचोदयात्॥
सरल भावार्थ
हम गजध्वज स्वरूप बुध का ध्यान करते हैं। बुध हमारी बुद्धि को प्रकाशित और उचित दिशा में प्रेरित करें।
5. गुरु गायत्री मंत्र
बृहस्पति को देवगुरु कहा जाता है और उन्हें ज्ञान तथा गुरु-तत्त्व से संबंधित माना जाता है।
गुरु गायत्री मंत्र
ॐ वृषभध्वजाय विद्महे घृणिहस्ताय धीमहि।
तन्नो गुरुः प्रचोदयात्॥
सरल भावार्थ
हम गुरु बृहस्पति का ध्यान करते हैं। वे हमारी बुद्धि को ज्ञान और सद्विवेक की दिशा में प्रेरित करें।
6. शुक्र गायत्री मंत्र
शुक्र को भारतीय ज्योतिष परंपरा में शुक्राचार्य से संबंधित माना जाता है।
शुक्र गायत्री मंत्र
ॐ अश्वध्वजाय विद्महे धनुर्हस्ताय धीमहि।
तन्नः शुक्रः प्रचोदयात्॥
सरल भावार्थ
हम अश्वध्वज और धनुष धारण करने वाले शुक्र का ध्यान करते हैं। वे हमारी बुद्धि को शुभ दिशा में प्रेरित करें।
7. शनि गायत्री मंत्र
शनिदेव को कर्म और न्याय की अवधारणा से जोड़ा जाता है।
शनि गायत्री मंत्र
ॐ काकध्वजाय विद्महे खड्गहस्ताय धीमहि।
तन्नो मन्दः प्रचोदयात्॥
सरल भावार्थ
हम काकध्वज और खड्गधारी शनिदेव का ध्यान करते हैं। मन्द अर्थात शनिदेव हमारी बुद्धि को उचित दिशा में प्रेरित करें।
8. राहु गायत्री मंत्र
वैदिक ज्योतिष में राहु को छाया ग्रह कहा जाता है।
राहु गायत्री मंत्र
ॐ नागध्वजाय विद्महे पद्महस्ताय धीमहि।
तन्नो राहुः प्रचोदयात्॥
सरल भावार्थ
हम नागध्वज स्वरूप राहु का ध्यान करते हैं। राहु हमारी बुद्धि को उचित दिशा में प्रेरित करें।
9. केतु गायत्री मंत्र
केतु भी ज्योतिषीय परंपरा का छाया ग्रह है।
केतु गायत्री मंत्र
ॐ अश्वध्वजाय विद्महे शूलहस्ताय धीमहि।
तन्नः केतुः प्रचोदयात्॥
सरल भावार्थ
हम अश्वध्वज और शूलधारी केतु का ध्यान करते हैं। केतु हमारी बुद्धि को उचित दिशा में प्रेरित करें।
सभी 9 नवग्रह गायत्री मंत्र एक साथ
सूर्य
ॐ अश्वध्वजाय विद्महे पाशहस्ताय धीमहि।
तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्॥
चन्द्र
ॐ पद्मध्वजाय विद्महे हेमरूपाय धीमहि।
तन्नः सोमः प्रचोदयात्॥
मंगल
ॐ वीरध्वजाय विद्महे विघ्नहस्ताय धीमहि।
तन्नो भौमः प्रचोदयात्॥
बुध
ॐ गजध्वजाय विद्महे शुकहस्ताय धीमहि।
तन्नो बुधः प्रचोदयात्॥
गुरु
ॐ वृषभध्वजाय विद्महे घृणिहस्ताय धीमहि।
तन्नो गुरुः प्रचोदयात्॥
शुक्र
ॐ अश्वध्वजाय विद्महे धनुर्हस्ताय धीमहि।
तन्नः शुक्रः प्रचोदयात्॥
शनि
ॐ काकध्वजाय विद्महे खड्गहस्ताय धीमहि।
तन्नो मन्दः प्रचोदयात्॥
राहु
ॐ नागध्वजाय विद्महे पद्महस्ताय धीमहि।
तन्नो राहुः प्रचोदयात्॥
केतु
ॐ अश्वध्वजाय विद्महे शूलहस्ताय धीमहि।
तन्नः केतुः प्रचोदयात्॥
नवग्रह गायत्री मंत्र का जप कैसे करें?
नवग्रह मंत्रों के जप की विधि अलग-अलग धार्मिक और पारिवारिक परंपराओं में भिन्न हो सकती है।
सामान्य साधना के लिए स्नान करके स्वच्छ स्थान पर बैठें। सबसे पहले अपने इष्टदेव और भगवान गणेश का स्मरण करें।
इसके बाद जिस ग्रह का मंत्र पढ़ना चाहते हैं उसका ध्यान करके मंत्र का स्पष्ट और शांत उच्चारण करें।
जप संख्या अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार रखी जा सकती है। मंत्र का उच्चारण जल्दबाजी में करने की बजाय स्पष्ट रूप से करना बेहतर है।
विशेष अनुष्ठान, बीज मंत्र, ग्रह-दोष शांति या बड़ी जप-संख्या वाले अनुष्ठान के लिए योग्य आचार्य से अपनी परंपरा के अनुसार मार्गदर्शन लिया जा सकता है।
नवग्रह शांति बीज मंत्र
नवग्रहों से संबंधित ये बीज मंत्र भी विभिन्न पूजा-पद्धतियों में प्रचलित हैं।
सूर्य:
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः॥
चन्द्र:
ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः सोमाय नमः॥
मंगल:
ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः॥
बुध:
ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः॥
गुरु:
ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः॥
शुक्र:
ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः॥
शनि:
ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः॥
राहु:
ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः॥
केतु:
ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः॥
नवग्रह गायत्री मंत्र का महत्व
गायत्री-रूप के इन मंत्रों में संबंधित ग्रह का ध्यान करते हुए बुद्धि को प्रेरित और प्रकाशित करने की प्रार्थना की जाती है।
भारतीय धार्मिक एवं ज्योतिषीय परंपरा में नवग्रह उपासना को ग्रहों के प्रति श्रद्धा और आध्यात्मिक साधना से जोड़ा जाता है।
मंत्र-जप को किसी निश्चित धन-लाभ, रोग-मुक्ति, विवाह, नौकरी या अन्य परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं समझना चाहिए।
नवग्रह गायत्री मंत्र से जुड़े प्रश्न – FAQ
नवग्रह गायत्री मंत्र क्या है?
सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु से संबंधित गायत्री-रूप मंत्रों को सामूहिक रूप से नवग्रह गायत्री मंत्र कहा जाता है।
नवग्रह कौन-कौन से हैं?
सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु नवग्रह हैं।
क्या सभी नवग्रह गायत्री मंत्रों का एक ही पाठ मिलता है?
नहीं। विभिन्न धार्मिक ग्रंथों, पूजा-पद्धतियों और परंपराओं में कई नवग्रह गायत्री मंत्रों के अलग-अलग पाठांतर मिलते हैं।
क्या सभी 9 ग्रहों के मंत्र एक साथ पढ़ सकते हैं?
सामान्य भक्ति और स्मरण के रूप में सभी नौ मंत्र क्रम से पढ़े जा सकते हैं। किसी विशेष ग्रह-शांति अनुष्ठान के लिए संबंधित परंपरा या योग्य आचार्य का मार्गदर्शन लिया जा सकता है।
नवग्रह मंत्र कितनी बार पढ़ना चाहिए?
सामान्य भक्ति में जप संख्या श्रद्धानुसार रखी जा सकती है। विशेष अनुष्ठान में जप संख्या परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।
राहु और केतु क्या ग्रह हैं?
भारतीय ज्योतिष में राहु और केतु को छाया ग्रह कहा जाता है। खगोलीय दृष्टि से ये भौतिक ग्रह नहीं, बल्कि चन्द्रमा की कक्षा और क्रांतिवृत्त के प्रतिच्छेदन से संबंधित बिंदु हैं।
नव ग्रह शांति मंत्र – Navagraha Gayatri Mantra
- सूर्य मंत्र: ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नम:।
- चंद्र मंत्र: ओम श्रां श्रीं श्रौं सः सोमाय नमः ।
- मंगल मंत्र: ओम क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम: ।
- बुध मंत्र: ओम ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः ।
- गुरु (गुरुवार के उपाय) मंत्र: ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरुवे नमः।
- शुक्र मंत्र: ओम द्रां द्रीं द्रौम सः शुक्राय नमः ।
- शनि मंत्र: ओम प्रां प्रीं प्रोम सह शनै नमः ।
- राहु मंत्र: ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः।
- केतु मंत्र: ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः।
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निष्कर्ष
नवग्रह गायत्री मंत्र सूर्य से लेकर केतु तक नौ ग्रहों के स्मरण और उपासना से संबंधित मंत्र हैं। इनके विभिन्न पाठांतर धार्मिक परंपराओं में प्रचलित हैं।
मंत्रों का पाठ श्रद्धा, शुद्ध उच्चारण और शांत मन से करना चाहिए। आध्यात्मिक साधना का उद्देश्य केवल सांसारिक फल की अपेक्षा न होकर आत्मचिंतन, प्रार्थना और सद्बुद्धि की कामना भी है।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥




















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