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Saturday, February 17, 2018

प्रारब्ध क्या हे | श्रीमद भगवद गीता | कर्म के प्रकार | Types of Karma

श्रीमद भगवद गीता अनुसार कर्म और कर्मयोगी की परिभाषा प्रारब्ध क्या हे कैसे बनती हे और उसे कौन बनाता हे ? | निष्काम कर्म योग किसे कहते हे


सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ।।

कर्मण्ये वाधिका रस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्म फल हेतुरभुह, माँ ते संगोत्स्व कर्मण्ये।।



(१)-संचित कर्म
संचित का अर्थ है – संपूर्ण, कुलयोग| अर्थात, मात्र इस जीवन के ही नहीं अपितु पूर्वजन्मों के सभी कर्म जो आपने उन जन्मों में किये हैं | आपने इन कर्मों को एकत्र करके अपने खाते में डाल लिया है |

उदाहरण के रूप में कोई आप का अपमान करे और आप क्रोधित हो जाएँ तो आपके संचित कर्म बढ़ जाते हैं| परन्तु,यदि कोई अपमान करे और आप क्रोध ना करें तो आप के संचित कर्म कम होते हैं |

प्रत्येक जन्म में किये गये संस्कार एवं उसके फल भाव का संचित कोष तैयार हो जाता है.यह उस जीव की व्यक्तिगत पूँजी है जो अच्छी या बुरी दोनों प्रकार की हो सकती है यही संचित कोष संचित कर्म कहा जाता है, और मनुष्य इसे हर जन्म में नये रूप में अर्जित करता रहता है.

इस तरह संचित कर्म का सम्बन्ध मानसिक कर्म से भी होता है जैसे ईर्ष्या,क्रोध,बदला लेने की भावना अथवा क्षमा,दया इत्यादि की भावना मनुष्य में संचित कर्मों के आधार पर ही पायी जती है अशुभ चिंतन में अशुभ संचित कर्म व शुभ चिन्तन में शुभ संचित कर्म बनते हैं.

जीवन में तीन चीजों का संयोग होता है -आत्मा,मन,और शरीर

शरीर और आत्मा के मध्य सेतु है मन.यदि मन किसी प्रकार के संस्कार निर्मित न करे और पूर्व संस्कारों को क्षय करे टो वह मन अपना अस्तित्व ही खो देगा और मनुष्य का जन्म नहीं होगा .

संचित कर्मों का प्रभाव -प्रत्येक मनुष्य अपने पूर्व जन्मों में भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में पैदा हुआ था.जिससे उसके कर्म भी भिन्न-भिन्न प्रकार के रहे,उसकी प्रतिभा का विकास भी भिन्न-भिन्न प्रकार से हुआ होगा.
इन्ही पिछले संस्कारों के कारण कोई व्यक्ति कर्मठ या आलसी स्वाभाव का होता है,यह संचित कोष ही पाप और पुण्य का ढेर होता है. इसी ढेर के अनुसार वासनायें,इच्छायें,कामनायें,ईर्ष्या,द्वेष,क्रोध,क्षमा इत्यादि होते हैं.
ये संस्कार बुद्धि को उसी दिशा की ओर प्रेरित करते हैं जैसा की उसमे संग्रहीत हों.

(२ )-प्रारब्ध
‘प्रारब्ध’, ‘संचित’ का एक भाग, इस जीवन के कर्म हैं| आप सभी संचित कर्म इस जन्म में नहीं भोग सकते क्यूंकि यह बहुत से पूर्वजन्मों का बहुत बड़ा संग्रह है| इसलिए इस जीवन में आप जो कर्म करते हैं, प्रारब्ध, वो आप के संचित कर्म में से घटा दिया जायेगा| इस प्रकार इस जीवन में आप केवल प्रारब्ध भोगेंगे,जो आप के कुल कर्मों का एक भाग है|वे मानसिक कर्म होते हैं, जो स्वेच्छापूर्वक जानबूझकर, तीव्र भावनाओं से प्रेरित होकर किए जाते हैं।

प्रारब्ध -कर्मों के फल अंश का कुछ हिस्सा इस जन्म के भोग के लिये निश्चित होता है या इस जन्म में जिन संचित कर्मों का भोग आरम्भ हो चुका है वही प्रारब्ध है.इसी प्रारब्ध के अनुसार मनुष्य को अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियों में जन्म लेना पड़ता है.

इसका भोग तीन प्रकार से होता है -
अनिच्छा से -वे बातें जिन पर मनुष्य का वश नहीं और न ही विचार किया हो जैसे भूकंप आदि.
परेच्छा से -दूसरों के द्वारा दिया गया सुख दुःख .
स्वेच्छा से -इस समय मनुष्य की बुद्धि ही वैसी हो जाया करती है, जिससे वह प्रारब्ध के वशीभूत अपने भोग के लिये स्वयं कारक बन जाता है ;किसी विशेष समय में विशेष प्रकार की बुद्धि हो जाया करती है तथा उसके अनुसार निर्णय लेना प्रारब्ध है
प्रारब्ध में न हो तो मुँह तक पोहकचर भी निवाला छीन जाता हे

(३ )-क्रियमाण तीसरा कर्म क्रियमाण है,कर्म शारीरिक हैं, जिनका फल प्रायः साथ के साथ ही मिलता रहता है। नशा पिया कि उन्माद आया।विष खाया कि मृत्यु हुई। शरीर जड़ तत्त्वों का बना हुआ है। भौतिक तत्त्व स्थूलता प्रधान होते हैं। उसमें तुरंत ही बदलामिलता है। अग्नि के छूते ही हाथ जल जाता है। नियम के विरुद्ध आहार–विहारकरने पर रोगों की पीड़ा का, निर्बलता का अविलम्ब आक्रमण हो जाता है और उसकी शुद्धि भी शीघ्र हो जाती है।

क्रियमाण -तात्कालिक किये जाने वाले कर्म.जो कर्म हम दिन रात इस जीवन में कर रहे हे वो कर्म | क्रियामान कर्म से ही संचित कर्मों का निर्माण होता है| तो यह जोड़ घटाना कैसे चलता है?

जो भी कर्म हम पूर्ण चैतन्यता से नहीं करते वो क्रिया नहीं प्रतिक्रिया है | जिसके प्रति आप चैतन्य नहीं हैं वो क्रिया नहीं हो सकती | और जब हम बिना चैतन्यता के कर्म करते हैं,जैसा प्रायः दैनिक जीवन में होता है तो हमारे संचित कर्म बढ़ जाते हैं | यदि कोई आप का अपमान करे और आप क्रोधित हो जाएँ तो आपके संचित कर्म बढ़ जाते हैं| परन्तु,यदि कोई अपमान करे और आप क्रोध ना करें तो आप के संचित कर्म कम होते हैं|

इसे मैं एक योगी के उदाहरण से रूप में समझते हे | योगी एक वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न थे कि तभी एक व्यक्ति वह आया और उनका बहुत अपमान किया | वो शांत रहे | कोई प्रतिक्रिया नहीं हुयी (ना ब्राह्य रूप से ना आंतरिक रूप से) उन्हें क्रोध भी नहीं आया| बाद में उनके शिष्यों ने,जो सब कुछ देख सुन रहे थे,पूछा कि आप को क्रोध नहीं आया? तो उन्होंने उत्तर दिया कि संभवतः पूर्वजन्म में मैंने उसका अपमान किया था, वास्तव में मैं प्रतीक्षा में था कि वो आकर मेरा अपमान करे | अब मेरा हिसाब बराबर हो गया | अगर मैं क्रोध करता तो फिर कर्म संचित हो जाते |


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