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Tuesday, May 26, 2020

कृष्ण ने अर्जुन का अहंकार कैसे तोड़ा | Arjun Hanumanji

कृष्ण ने अर्जुन का अहंकार कैसे तोड़ा - Arjun's Ego Broken

अहंकार किसी भी मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन होता हे और यही अहंकार जब भगवान् के भक्तो को घेरता हे तो भगवान् स्वयं उनका अहंकार नष्ट करते हे दोस्तों इस वीडियो में हम आपको बताएँगे की भगवान् श्रीकृष्ण के कहने पर हनुमानजी ने कैसे तोडा था अर्जुन का घमंड

आनंद रामायण में इस प्रसंग का वर्णन मिलता है और अर्जुन के रथ पर हनुमान के विराजित होने के पीछे भी यही कारण था ।

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दोस्तों एक बार अर्जुन अपने रथ पर रामेश्वरम से गुजर रहे थे जहा उन्होंने एक कपि को पथ्थरो के सेतु पर श्रीराम का स्मरण करते हुए देखा | अर्जुन ने जाने बिना की वो कौन हे उन्हें जगाने के लिए बाण चला दिया और हसने लगे जब बजरंग बलि ने अर्जुन से उनकी हंसी का कारण पूछा तो अर्जुन बोले की उन्हें पत्थरों का सेतु देखकर हंसी आ रही हे | अर्जुन ने बताया की मुज जैसे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर के होने पर भी लोग पथ्थरो का सेतु क्यों बनाते हे ?

Arjun Hanuman Story

हनुमानजी ने कहाँ प्रभु श्रीराम ने भी तो बनवाया था पथ्थरो का सेतु
अर्जुन ने कहा प्रभु श्रीराम जैसे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर को पथ्थरों से नहीं अपने बाणो से सेतु का निर्माण करना चाहिए था
आगे अर्जुन ने कहा- आपके स्वामी श्रीराम तो बड़े ही श्रेष्ठ धनुषधारी थे तो फिर उन्होंने समुद्र पार जाने के लिए पत्थरों का सेतु बनवाने की क्या आवश्यकता थी?

हनुमानजी ने समझाया की प्रभु श्रीराम की सेना में महाबली वानर शामिल थे |यदि एक भी वानर बाणो के सेतु पर चढ़ता तो सेतु छिन्न-भिन्न हो जाता। अर्थात टूट जाता

इसपर अर्जुन ने घमंड दिखाते हुए कहा की आगे नदी पर स्वयं मेने बाणो का सेतु बनाया हे और उस पर रथ दौड़ाते हुए ही में यहा पंहुचा हु

हनुमानजी ने कहा- ये तुम्हारा भ्रम हे मेरा भार तुम्हारा सेतु नहीं ले पाएगा

अर्जुन ने कहा हे कपि में अगर बाणो का सेतु बनाता हु अगर तुम उसे तोड़ नहीं पाए तो। ….
हनुमानजी ने कहा तो में आपका दास बन जाऊंगा

लेकिन अगर में आपके सेतु को तोड़ दूंगा तब आप क्या करोगे
अर्जुन ने कहा तो मैं अपने आप को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर नहीं मानुंगा
हनुमानजी ने शर्त का स्वीकार किया तब अर्जुन ने अपने प्रचंड बाणों से सेतु तैयार किया। और हनुमनजी के सामने उसे तोड़ने की चुनौती रखखी लेकिन जैसे ही हनुमान जी ने प्रभु श्री राम का स्मरण करते हुए उस बाणों के सेतु पर छलांग लगाई और एक ही बार में बाणो से बनाये सेतु को तोड़ दिया
अब अर्जुन का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने का घमंड टूट चूका था और वे निराश हो गए और तब हनुमानजी ने उन्हें एहसास दिलाया की अपने अहंकार में उन्होंने भगवान् श्रीराम का भी अपमान कर दिया हे

अपनी गलती का एहसास होते ही अर्जुन ने आत्मग्लानि के भाव से एक बाण से भयानक अग्नि प्रज्वलित की

हनुमानजी ने पूछा आप ये क्या कर रहे हे तब अर्जुन ने कहा प्रभु श्रीराम के अपमान का कारण मेरी विद्या हे इसीलिए में मेरी विद्या के साथ ही आत्मदाह करने जा रहा हु

हनुमानजी ने भगवान् श्रीकृष्ण का स्मरण किया और भगवान् श्रीकृष्ण ने तुरंत प्रकट होकर अर्जुन को रोक लिया

भगवान् श्रीकृष्ण ने ही हनुमनजी को अर्जुन का घमंड चूर करने के लिए भेजा था ताकि घमंड के कारण अर्जुन अपने रास्ते से भटक न जाये

भगवानश्री कृष्ण ने कहा - अहंकार का नष्ट होना तो अच्छी बात हे अहंकार मनुष्य को वो बना देता हे जो वो वास्तविकता में नहीं होता अहंकार का मारा योद्धा अपनी क्षमता और योग्यता का गलत अनुमान लगाता हे

अर्जुन ने कहा हे वासुदेव मुझसे बड़ी भूल हो गयी मुझे क्षमा करे - भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को क्षमा करते हे

अर्जुन ने हनुमानजी का धन्यवाद करते हुए कहा हे वानरश्रेष्ठ आपने मेरे अहंकार को तोड़कर और मेरे पाप की और संकेत करके मुज पर बहुत बड़ा उपकार किया हे कृपया मुझे बताये की आप कौन हे

तब भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा तुम जिसे वानरश्रेष्ठ कह रहे हो वो पवनपुत्र हनुमान हे किन्तु हनुमान का उदेश्य तुम्हे नष्ट करना नहीं था तुम्हे सही रास्ता दिखाना था

अर्जुन हनुमानजी से क्षमा मांगते हे

हनुमानजी अर्जुन को क्षमा करते हे और शिक्षा देते हुए केहते हे की - हे अर्जुन जो योद्धा अहंकार को जीत लेता हे वो दूसरे सारे शत्रु को परास्त करता हे क्युकी किसी भी शत्रु अथवा मनुष्य का इस संसार में अहंकार से बड़ा कोई शत्रु नहीं हे जिसने अहंकार को जीता मानो उसने संसार को जित लिया

अर्जुन ने कहा हनुमानजी आप महाज्ञानी हे और आज अपने ज्ञान भंडार से ज्ञान देकर आप मेरे गुरु बन गए में आपका आभारी हु आपका आशीर्वाद सदा मेरे साथ रहे यही मेरी इच्छा हे

इसलिए हनुमान जी महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ के ऊपर बैठे थे

दोस्तों आमतौर पर हर किसी को अपने ऊपर अभिमान हो जाता है। ये अहंकार ही इंसान और भगवान् से मिलन में सबसे बड़ी बाधा है

परमात्मा कभी अपने भक्तों में अभिमान रहने नहीं देते | अगर भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन का घमंड दूर न करते तो अर्जुन उनके निकट नहीं रह सकते थे जो की महाभारत युद्ध का मुख्य केंद्र थे... और परमात्मा के निकट वही रह सकता है जो अहंकार से रहित होता हे

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