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Sunday, June 16, 2019

वट सावित्री व्रत कथा | Vat Savitri Story in hindi

Vat Savitri Story in hindi

हरसाल सुहागिन महिलाओं द्वारा ज्येष्ठ मास की अमावस्या को वट सावित्री व्रत रखा जाता है। कहा जाता है कि वटवृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु व डालियों व पत्तियों में भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। इस व्रत में महिलाएं वट वृक्ष की पूजा करती हैं

वट सावित्री व्रत कथा

प्राचीन काल में अश्वपति नाम के एक राजा राज करते थे। वह बड़े ही धर्मात्मा एवं जितेंद्रिय थे। राजा को कोई संतान नहीं थी। इसलिए उन्होंने संतान प्राप्ति की कामना से 18 वर्षों तक सावित्री देवी ने कठोर तप कीया |  देवी सावित्री ने उन्हें एक तेजस्विनी कन्या की प्राप्ति का वर दिया।

Vat Savitri Story in hindi

जिससे राजा के घर एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया। राजा ने उस कन्या का नाम सावित्री रखा। राजकन्या शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की भांति दिनों दिन बढऩे लगी। धीरे-धीरे अब वह कन्या बड़ी हो गयी

विवाह योग्य होने पर राजा ने उन्हें विवाह के लिए स्वयं अपने योग्य वर की खोजकरने  को कहा | सावित्री ने तपोवन में अपने माता-पिता के साथ निवास कर रहे द्युमत्सेन से प्रभावित  हुए  और उन्हें  अपना वर चुनने का निश्चय कर लिया और जब वे अपने पिता को ये बात बताने गयी तब नारद जी भी वहा मौजूद थे सावित्री ने उन दोनों के चरणों में श्रद्धा से प्रणाम किया। और बताया की में तपोवन में अपने माता-पिता के साथ निवास कर रहे द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान से विवाह करना चाहती हु 

सावित्री के बात पर नारद जी चौंक उठे और राजा से कहा की सत्यवान के पिता शत्रुओं के द्वारा राज्य से वंचित कर दिए गए हैं और वह वन में तपस्वी जीवन व्यतीत कर रहे हैं और अंधे भी हो चुके हैं। सबसे बड़ी बात तो यह हे कि सत्यवान की आयु अब केवल एक वर्ष ही शेष है।

नारद जी की बात सुनकर राजा अश्वपति चिंतित हो उठे और उन्होंने अपनी पुत्री से कहा अब तुम फिर से यात्रा करो और किसी दूसरे योग्य वर का वरण करो।’’

सावित्री सती थी। उसने दृढ़ता से कहा -पिताजी! सत्यवान चाहे अल्पायु हों या दीर्घायु अब तो वही मेरे पति हैं। जब मैंने एक बार उन्हें अपना पति स्वीकार कर लिया फिर मैं दूसरे पुरुष का वरण कैसे कर सकती हूं?

सावित्री का निश्चय दृढ़ जानकर महाराज अश्वपति ने उसका विवाह सत्यवान से कर दिया। धीरे-धीरे वह समय भी आ पहुंचा जिसमें सत्यवान की मृत्यु निश्चित थी। सावित्री ने उसके चार दिन पूर्व से ही निराहार व्रत रखना शुरू कर दिया था। इसी समय सत्यवान के सिर में बहुत पीड़ा होने लगी। सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे अपने गोद में पति के सिर को रख उसे लेटा दिया। उसी समय सावित्री ने देखा अनेक यमदूतों के साथ यमराज आ पहुंचे है। सत्यवान के जीव को दक्षिण दिशा की ओर लेकर जा रहे हैं। यह देख सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चल देती हैं।
उन्हें आता देख यमराज ने कहा कि- हे पतिव्रता नारी! पृथ्वी तक ही पत्नी अपने पति का साथ देती है। अब तुम वापस लौट जाओ। उनकी इस बात पर सावित्री ने कहा- जहां मेरे पति रहेंगे मुझे उनके साथ रहना है। यही मेरा पत्नी धर्म है और यही सनातन सत्य है

सावित्री के पतिव्रत धर्म को देखकर यमराज बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने सावित्री को तीन वर मांगने को कहा  तब सावित्री ने 
  • पहले वर में सास-ससुर के लिए नेत्र ज्योति मांगी 
  • दूसरे वर में ससुर का खोया हुआ राज्य वापस मांगा और 
  • तीसरे वर में अपने पति सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनने का वर मांगा। 
सावित्री के ये तीनों वरदान सुनने के बाद यमराज ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा- तथास्तु! 

‍सावित्री पुन: उसी वट वृक्ष के पास लौट आई। जहां सत्यवान मृत पड़ा था। सत्यवान के मृत शरीर में फिर से चेतना आ गयी । इस प्रकार सावित्री ने अपने पतिव्रता व्रत के प्रभाव से न केवल अपने पति को पुन: जीवित करवाया बल्कि सास-ससुर को नेत्र ज्योति प्रदान करते हुए उनके ससुर को खोया राज्य फिर दिलवाया। 

वट सावित्री अमावस्या के दिन वट वृक्ष का पूजन-अर्चन और व्रत करने से सौभाग्यवती महिलाओं की ही मनोकामना पूर्ण होती है और उनका सौभाग्य अखंड रहता है।

सावित्री के पतिव्रता धर्म की कथा का सार यह है कि एकनिष्ठ पतिपरायणा स्त्रियां अपने पति को सभी दुख और कष्टों से दूर रखने में समर्थ होती है। जिस प्रकार पतिव्रता धर्म के बल से ही सावित्री ने अपने पति सत्यवान को यमराज के बंधन से छुड़ा लिया था। इतना ही नहीं खोया हुआ राज्य तथा अंधे सास-ससुर की नेत्र ज्योति भी वापस दिला दी। उसी प्रकार महिलाओं को अपना गुरु केवल पति को ही मानना चाहिए। 

इसलिए सभी विवाहित स्त्रीयां वटसावित्री का व्रत अपने वैवाहिक जीवन को सुखमय्, पुत्र प्राप्ति और पति की दीर्घायु के लिए रखती है।

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