Update

Saturday, June 16, 2018

कर्ण और दम्बोद्भव | नर और नारायण


कर्ण (Karn) – कर्ण महाभारत मे एक बहुत ही मुख्य किरदार थे . इसमे कर्ण के बारे मे बताया गया है.कर्ण अपने पिछले जन्म में एक असुर राजा दम्भोद्भावा था. उसने कठिन तपस्या कर सूर्य को खुश किया. वे वरदान में सूर्य से “अमरत्व” का वरदान मांगते है. लेकिन सूर्य ये बोल कर मना कर देते है कि ऐसा नहीं हो सकता. जिसके बाद दम्भोद्भावा उनसे हजारों सेना रुपी कवच की मांग करते है जो उनकी रक्षा करे और ये भी बोलते है की एक कवच को मारने के लिए इन्सान को 1000 वर्ष तक तपस्या करनी होगी और उस कवच के मरते ही वो इन्सान भी मर जायेगा. धरती के सभी लोग इस असुर से परेशान थे 


सूर्यदेवता बड़े चिंतित हुए। वे इतना तो समझ ही पा रहे थे कि यह असुर इस वरदान का दुरपयोग करेगा, किन्तु उसकी तपस्या के आगे वे मजबूर थे।उन्हे उसे यह वरदान देना ही पडा ।

इन कवचों से सुरक्षित होने के बाद वही हुआ जिसका सूर्यदेव को डर था । दम्बोद्भव अपने सहस्र कवचों की सहक्ति से अपने आप को अमर मान कर मनचाहे अत्याचार करने लगा । वह “सहस्र कवच” नाम से जाना जाने लगा ।

उधर सती के पिता “दक्ष प्रजापति” ने अपनी पुत्री “मूर्ति” का विवाह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र “धर्म” से किया । मूर्ति ने सहस्र्कवच के बारे में सुना हुआ था और उन्होंने श्री हरि नारायण से प्रार्थना की कि इसे ख़त्म करने के लिए जन्म ले । 
श्री हरि नारायण ने उसे तथास्तु कहकर अद्धश्य हो गए ।कालांतर में मूर्ति ने दो जुडवा पुत्रों को जन्म दिया नर और नारायण । श्री हरि नारायण ने एक साथ दो शरीरों में नर और नारायण के रूप में अवतरण किया था । दोनों भाई बड़े हुए। एक बार दम्बोध्भव और नर आमने सामने हो गए तब नर ने दम्बोध्भव  को युद्ध के लिए ललकारा | दम्बोद्भव ने नर को कहा में अजय हु और मेरा कवच सिर्फ वही तोड़ सकता है जिसने हज़ार वर्षों तक तप किया हो । नर ने कहा कि मैं और मेरा भाई नारायण एक ही हैं वह मेरे बदले तप कर रहे हैं तब नर और दम्बोध्भव के बीच भीषण युद्ध हुआ | जैसे जैसे युद्ध चला नारायण के तप से नर की शक्ति बढ़ रही थी | हज़ार वर्ष का समय पूर्ण होते हु नर ने  दम्बोध्भव का एक कवच तोड़ दिया।
और  नर मृत हो कर वहीँ गिर पड़े क्योकि सूर्यदेव ने उन्हें वरदान जो दिया था दम्बोध्भव खुस हो रहे थे तभी उसने देखा की नर उसकी और दौड़े आ रहा है और वह आश्चर्यचकित हो गया । अभी तो उसके सामने नर की मृत्यु हुई थी और वो जीवित कैसे हो गया | लेकिन वो नर नहीं नारायण थे जो शिवजी की तपस्या कर रहे थे | नारायण को शिवजी से मृत्युंजय मन्त्र की प्राप्ति हुए थी जिससे वे अपने भाई को पुनर्जीवित कर सकते थे और नारायण ने मृत्युंजय मन्त्र से नर को पुनर्जीवित कर दिया 

अब नारायण ने दम्बोद्भव को युद्ध के लिए ललकारा और नर तपस्या में बैठे । हज़ार साल के युद्ध और तपस्या के बाद फिर एक कवच टूटा और नारायण की मृत्यु हो गयी । फिर नर ने आकर नारायण को पुनर्जीवित कर दिया, और यह चक्र चलता रहा । 

इस तरह 999 बार युद्ध हुआ । एक भाई युद्ध करता दूसरा तपस्या । जब 999 कवच टूट गए तो दम्बोद्भव समझ गया कि अब मेरी मृत्यु हो जायेगी । आखिरी कवच में दम्भोद्भाव सूर्य लोक में जा छुपा. 

नर-नारायण दम्भोद्भाव का पीछा करते सूर्य लोक पोहचे और सूर्यदेव को दम्भोद्भाव उन्हें सपने के लिए कहा | किन्तु अपने भक्त को सौंपने पर सूर्यदेव राजी न हुए। तब नारायण ने सूर्यदेव को श्राप दिया कि आप इस असुर को बचाने का प्रयास कर रहे हैं, जिसके लिए आप भी इसके पापों के भागीदार हुए और आप भी इसके साथ जन्म लेंगे इसका कर्मफल भोगने के लिए । इसके साथ ही त्रेतायुग समाप्त हुआ और द्वापर का प्रारम्भ हुआ ।

कालांतर में कुंती ने दुर्वाशा ऋषि की सेवा कर आशीर्वाद वरदान प्राप्त किया |  कुंती ने अपने वरदान को जांचते हुए सूर्यदेव का आवाहन किया और कर्ण का जन्म हुआ । लेकिन कर्ण  केवल सूर्यपुत्र ही नहीं बल्कि उसके भीतर सूर्य और दम्बोद्भव दोनों थे । जैसे नर और नारायण में दो शरीरों में एक आत्मा थी, उसी तरह कर्ण के एक शरीर में दो आत्माओं का वास है – सूर्य और सहस्रकवच । 

उसी तरह श्रीकृष्ण और अर्जुन ने नर और नारायण के रूप में जन्म लिया 

कर्ण के भीतर जो सूर्य का अंश है,वही उसे तेजस्वी वीर बनाता है । जबकि उसके भीतर दम्बोद्भव भी होने से उसके कर्मफल उसे अनेकानेक अन्याय और अपमान मिलते है, और उसे द्रौपदी का अपमान और ऐसे ही अनेक अपकर्म करने को प्रेरित करता है । यदि अर्जुन कर्ण का कवच तोड़ता, तो तुरंत ही उसकी मृत्यु हो जाती ।इसिलिये इंद्र उससे उसका कवच पहले ही मांग ले गए थे।




No comments:

Post a Comment