गणेश चालीसा हिंदी में | Ganesh Chalisa Lyrics in Hindi

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Ganesh Chalisa श्री गणेश चालीसा हिंदी में सम्पूर्ण पाठ
भगवान श्री गणेश को समर्पित सम्पूर्ण गणेश चालीसा

गणेश चालीसा (Ganesh Chalisa) भगवान श्री गणेश को समर्पित एक लोकप्रिय भक्तिपूर्ण स्तुति है। इसमें गणपति के स्वरूप, गुण, महिमा तथा उनसे जुड़े पौराणिक प्रसंगों का वर्णन मिलता है।

भगवान गणेश को गणपति, विनायक, गजानन, एकदन्त और विघ्नहर्ता जैसे अनेक नामों से स्मरण किया जाता है। हिंदू धार्मिक परंपरा में किसी भी शुभ कार्य और पूजा के आरम्भ में भगवान गणेश के स्मरण का विशेष महत्व माना गया है।

इस लेख में सम्पूर्ण श्री गणेश चालीसा हिंदी में, इसका धार्मिक महत्व, पाठ करने की सामान्य विधि और इससे जुड़े प्रश्नों के उत्तर पढ़ें।


गणेश चालीसा – संक्षिप्त जानकारी

पाठ: श्री गणेश चालीसा
आराध्य: भगवान श्री गणेश
भाषा: हिंदी / अवधी-ब्रज मिश्रित लोकभाषा
प्रकार: चालीसा / भक्तिपूर्ण स्तुति
प्रसिद्ध आरंभ: जय गणपति सदगुण सदन
विशेष अवसर: गणेश चतुर्थी, बुधवार एवं गणेश पूजा


श्री गणेश चालीसा | Ganesh Chalisa Lyrics

॥ दोहा ॥

जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

॥ चौपाई ॥

जय जय जय गणपति गणराजू।
मंगल भरण करण शुभ काजू॥

जै गजबदन सदन सुखदाता।
विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥

वक्रतुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन।
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥

राजत मणि मुक्तन उर माला।
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।
मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥

सुन्दर पीताम्बर तन साजित।
चरण पादुका मुनि मन राजित॥

धनि शिवसुवन षडानन भ्राता।
गौरी ललन विश्वविख्याता॥

ऋद्धि-सिद्धि तव चँवर सुधारे।
मूषक वाहन सोहत द्वारे॥

कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी।
अति शुचि पावन मंगलकारी॥

एक समय गिरिराज कुमारी।
पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी॥

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।
तब पहुँच्यो तुम धरि द्विज रूपा॥

अतिथि जानि कै गौरि सुखारी।
बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥

अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा।
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥

मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला।
बिना गर्भ धारण यहि काला॥

गणनायक गुण ज्ञान निधाना।
पूजित प्रथम रूप भगवाना॥

अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै।
पलना पर बालक स्वरूप ह्वै॥

बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना।
लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥

सकल मगन सुखमंगल गावहिं।
नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं॥

शम्भु उमा बहु दान लुटावहिं।
सुर मुनिजन सुत देखन आवहिं॥

लखि अति आनन्द मंगल साजा।
देखन भी आये शनि राजा॥

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।
बालक देखन चाहत नाहीं॥

गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो।
उत्सव मोर न शनि तुहि भायो॥

कहन लगे शनि मन सकुचाई।
का करिहौ शिशु मोहि दिखाई॥

नहिं विश्वास उमा उर भयऊ।
शनि सों बालक देखन कहाऊ॥

पड़तहिं शनि दृग कोण प्रकाशा।
बालक सिर उड़ि गयो अकाशा॥

गिरिजा गिरीं विकल ह्वै धरणी।
सो दुःख दशा गयो नहीं वरणी॥

हाहाकार मच्यो कैलाशा।
शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा॥

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो।
काटि चक्र सो गज शिर लायो॥

बालक के धड़ ऊपर धारयो।
प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे।
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे॥

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥

चले षडानन भरमि भुलाई।
रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई॥

चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।
तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥

धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे।
नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥

तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।
शेष सहसमुख सके न गाई॥

मैं मतिहीन मलीन दुखारी।
करहुँ कौन विधि विनय तुम्हारी॥

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।
जग प्रयाग ककरा दुर्वासा॥

अब प्रभु दया दीन पर कीजै।
अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै॥

॥ दोहा ॥

श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै धर ध्यान।
नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सम्मान॥

सम्बन्ध अपने सहस्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो, मंगलमूर्ति गणेश॥


गणेश चालीसा का सरल भावार्थ

गणेश चालीसा में भक्त भगवान गणेश के स्वरूप और गुणों का स्मरण करते हुए उनकी वंदना करता है।

आरम्भ में गणेशजी को विघ्नों को हरने वाले, मंगल करने वाले और बुद्धि प्रदान करने वाले देवता के रूप में नमन किया गया है।

इसके बाद उनके स्वरूप का वर्णन आता है—गजमुख, वक्रतुण्ड, विशाल नेत्र, मुकुट, मोदक तथा मूषक वाहन।

चालीसा के मध्य भाग में भगवान गणेश के जन्म से जुड़ी एक प्रचलित कथा का वर्णन मिलता है। इसमें माता पार्वती, भगवान शिव, शनिदेव और भगवान विष्णु से संबंधित प्रसंग आता है।

आगे भगवान गणेश और कार्तिकेय की बुद्धि-परीक्षा का प्रसंग मिलता है। पृथ्वी की परिक्रमा के स्थान पर गणेशजी अपने माता-पिता की परिक्रमा करते हैं।

इस प्रसंग का लोकप्रिय आध्यात्मिक भाव यह है कि माता-पिता के प्रति सम्मान, बुद्धि और विवेक का जीवन में विशेष महत्व है।

अंत में भक्त भगवान गणेश से दया, भक्ति और आध्यात्मिक शक्ति की प्रार्थना करता है।


गणेश चालीसा का महत्व

भगवान गणेश को हिंदू परंपरा में प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता के रूप में स्मरण किया जाता है।

गणेश चालीसा का पाठ मुख्य रूप से भगवान गणेश की स्तुति, उनके गुणों के स्मरण और भक्तिभाव की अभिव्यक्ति है।

धार्मिक परंपरा में भक्त भगवान गणेश से सद्बुद्धि, विवेक और जीवन की बाधाओं का सामना करने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं।

इसे किसी निश्चित धन-लाभ, रोग-मुक्ति या सांसारिक परिणाम की गारंटी के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय भक्ति और प्रार्थना के पाठ के रूप में समझना उचित है।


गणेश चालीसा कब पढ़ें?

गणेश चालीसा श्रद्धानुसार किसी भी दिन पढ़ी जा सकती है।

विशेष रूप से भक्त इसका पाठ इन अवसरों पर करते हैं:

  • गणेश चतुर्थी
  • बुधवार
  • संकष्टी चतुर्थी
  • गणेश पूजा
  • किसी शुभ कार्य के आरम्भ पर
  • दैनिक पूजा और प्रार्थना के समय

पाठ के लिए किसी कठिन नियम की आवश्यकता नहीं है। स्वच्छ स्थान पर शांत मन से भगवान गणेश का स्मरण करते हुए चालीसा पढ़ी जा सकती है।


गणेश चालीसा का पाठ कैसे करें?

स्नान आदि के बाद स्वच्छ स्थान पर भगवान गणेश के सामने बैठें।

यदि संभव हो तो दीप प्रज्वलित करें और भगवान गणेश का ध्यान करें।

आरम्भ में यह प्रसिद्ध गणेश मंत्र पढ़ सकते हैं:

ॐ गं गणपतये नमः॥

इसके बाद श्रद्धा और स्पष्ट उच्चारण के साथ गणेश चालीसा पढ़ें।

पाठ समाप्त होने पर भगवान गणेश से सद्बुद्धि, विवेक और उचित मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना करें।


गणेशजी का प्रसिद्ध मंत्र

ॐ गं गणपतये नमः॥

यह भगवान गणेश का अत्यंत प्रसिद्ध मंत्र है।

इसका सरल भाव है—

भगवान गणपति को मेरा नमस्कार है।


वक्रतुण्ड महाकाय मंत्र

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

सरल अर्थ

हे वक्रतुण्ड, विशाल शरीर वाले और करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी भगवान गणेश! मेरे कार्यों में आने वाली बाधाओं को दूर करने की कृपा करें।


गणेश चालीसा और गणेश जन्म कथा

इस चालीसा में भगवान गणेश के जन्म की एक विशेष लोक-प्रचलित कथा आती है जिसमें शनिदेव की दृष्टि और भगवान विष्णु द्वारा गज-मस्तक लाने का वर्णन है।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि भगवान गणेश के जन्म की एक ही कथा सभी ग्रंथों में समान रूप से नहीं मिलती।

पुराणों और बाद की धार्मिक परंपराओं में गणेश जन्म से संबंधित विभिन्न कथाएँ और पाठांतर मिलते हैं।

इसलिए गणेश चालीसा में वर्णित प्रसंग को इस चालीसा की अपनी कथात्मक परंपरा के संदर्भ में समझना उचित है।


गणेश और कार्तिकेय की परिक्रमा

गणेश चालीसा में बुद्धि-परीक्षा का प्रसिद्ध प्रसंग भी आता है।

भगवान शिव द्वारा परीक्षा लिए जाने पर कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा करने निकलते हैं, जबकि गणेशजी अपने माता-पिता की परिक्रमा करते हैं।

इस कथा का लोकप्रिय संदेश केवल गति से अधिक बुद्धि, विवेक और माता-पिता के सम्मान को महत्व देना है।

Shree Ram Chalisaश्री राम चालीसा
Shree Shiv Chalisaशिव चालीसा
Shree Krishna Chalisaश्रीकृष्ण चालीसा
Shree Hanuman Chalisaहनुमान चालीसा
Shree Laxmi Chalisaश्री लक्ष्मी चालीसा
Shree Saraswati Chalisa श्री सरस्वती चालीसा

गणेश चालीसा से जुड़े सामान्य प्रश्न – FAQ

गणेश चालीसा किस भगवान को समर्पित है?

गणेश चालीसा भगवान श्री गणेश की स्तुति में पढ़ा जाने वाला भक्तिपूर्ण पाठ है।

गणेश चालीसा कब पढ़ना चाहिए?

श्रद्धानुसार इसका पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है। बुधवार, गणेश चतुर्थी और संकष्टी चतुर्थी जैसे अवसरों पर इसका पाठ विशेष रूप से लोकप्रिय है।

क्या गणेश चालीसा रोज पढ़ सकते हैं?

हाँ। श्रद्धालु इसे अपनी दैनिक पूजा और प्रार्थना में शामिल कर सकते हैं।

गणेश चालीसा पढ़ने से पहले कौन-सा मंत्र बोलें?

आप भगवान गणेश का स्मरण करते हुए सरल मंत्र—
ॐ गं गणपतये नमः॥
का जप कर सकते हैं।

गणेश चालीसा में किस कथा का वर्णन है?

इसमें भगवान गणेश के जन्म से जुड़ा एक प्रचलित कथात्मक प्रसंग तथा गणेश और कार्तिकेय की बुद्धि-परीक्षा का वर्णन मिलता है।

क्या गणेशजी की जन्म कथा सभी पुराणों में एक जैसी है?

नहीं। गणेश जन्म के संबंध में विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में अलग-अलग कथाएँ और पाठांतर मिलते हैं।

भगवान गणेश की अन्य स्तुति और मंत्र

भगवान गणेश की आराधना के लिए ICanSpirit पर यह भी पढ़ें:

गणेश आरती – जय गणेश जय गणेश देवा

संकटनाशन गणेश स्तोत्र

ॐ गं गणपतये नमः मंत्र

श्री गणेशाष्टकम्

एकदन्ताय वक्रतुण्डाय


प्रार्थना

हे भगवान श्री गणेश! हमें सद्बुद्धि, विवेक और सही निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करें। हमारे मन में सकारात्मक विचार और सभी के प्रति करुणा का भाव जागृत करें।

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

॥ श्री गणेशाय नमः ॥


निष्कर्ष

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