Home Story चावल के एक दाने से कैसे भरा हज़ारों ऋषियों का पेट?

चावल के एक दाने से कैसे भरा हज़ारों ऋषियों का पेट?

चावल के एक दाने से कैसे भरा हज़ारों ऋषियों का पेट?

दोस्तों आप जानना चाहते हे कि चावल के एक दाने से कैसे भरा हज़ारों ऋषियों का पेट? तो आप सही आर्टिकल पढ़ रहे हो इस आर्टिकल में हम आपको पूरी कहानी बातएंगे इसे अंत तक जरूर पढ़े | द्वापरयुग में श्रीकृष्ण की भूमिका केवल महाभारत युद्ध में ही नहीं बल्कि उससे पहले भी कई मौकों पर उन्होंने द्रौपदी और पांडु पुत्रों की मदद की।

कहानी :चावल के एक दाने से कैसे भरा हज़ारों ऋषियों का पेट?
शैली :आध्यात्मिक कहानी
सूत्र :पुराण
मूल भाषा :हिंदी

महाभारत की कथा में कई बार श्रीकृष्ण इस बात का उल्लेख करते हैं कि धर्म पांडवों के साथ है इसलिए वे भी पांडु पुत्रों के साथ हैं। फिर वह चाहे द्रौपदी के चीरहरण का प्रसंग हो, या अर्जुन को युद्ध के लिए ब्रह्मास्त्र हासिल करने के लिए प्रेरित करने की बात, श्रीकृष्ण ने हर मौके पर पांडवों का साथ दिया।

चावल के एक दाने से कैसे भरा हज़ारों ऋषियों का पेट?

यही कारण रहा कि कई मौकों पर दुर्योधन अपनी पूरी कोशिश करने के बावजूद पांडवों को नुकसान नहीं पहुंचा सका। इसी में से एक प्रशंग था महर्षि दुर्वासा और उनके शिष्यों का |

महाभारत की कथा के अनुसार यह तब की बात है जब द्युत क्रीडा में अपना सबकुछ हारने के बाद पांडव जंगल में रहने आ गये थे। शर्त के अनुसार उन्हें 12 वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञातवास काटना था।दुर्वासा ऋषि पहले हस्तिनापुर गये वहां उनका खूब सत्कार हुआ।

दुर्योधन ने मौका देखते हुए चतुराई की और ऋषि दुर्वासा से कहा कि उसकी इच्छा है कि वो पांडवों के पास भी जाएं और उन्हें सेवा करने का मौका दें ताकि ऋषि का आशीर्वाद पांचों भाईयों को मिल सके। दुर्वासा ऋषि के क्रोध और शाप से सभी परिचित थे इसलिए दुर्योधन को लगा कि जंगल में अगर ऋषि का सत्कार अच्छे से नहीं हुआ तो वे पांडवों को जरूर शाप देंगे।

तब महर्षि दुर्वासा अपने हजारों शिष्यों के साथ पांडवों की कुटिया में आ पहुंचे। उन्होंने स्नान के बाद भोजन की इच्छा प्रकट की। युधिष्ठिर इसे टाल नहीं सके लेकिन पांडवों की एक समस्या थी।

उस समय युधिष्ठिर के पास एक अक्षय पात्र था। यह सूर्यदेव से उन्हें प्राप्त हुआ था। इससे दिन में एक बार जितना चाहे भोजन प्राप्त हो सकता था। लेकिन जब दुर्वासा ऋषि पांडवों के पास पहुंचे थे तब तक द्रौपदी के साथ सभीने भोजन कर लिया था । ऐसे में अब सवाल था कि दुर्वासा ऋषि और उनके शिष्यों के लिए इतनी जल्दी भोजन का प्रबंध कैसे किया जाए|

पांडव अब इस चिंता में डूबे थे कि अब क्या किया जाए। दुर्वासा ऋषि जब स्नान आदि कर अपने शिष्यों के साथ उनकी कुटिया में आएंगे तो वे क्या खिलायेगे । इसी चिंता में द्रौपदी ने भगवान कृष्ण का ध्यान किया और मदद मांगने लगी। श्रीकृष्ण उसी क्षण वहां पहुंच गये और कुटिया में प्रवेश करते ही द्रौपदी से कहा कि उन्हें बहुत भूख लगी है, कुछ खाने को दो।

द्रौपदी ने अपना सिर झुका लिया और कहा कि अब तो वे भी भोजन कर चुकी हैं और ऐसे में उस बर्तन में कुछ भी नहीं बचा है।

श्रीकृष्ण लीला

परन्तु श्रीकृष्ण कहां मानने वाले थे। उन्होंने द्रौपदी से वह बर्तन लाने को कहा। द्रौपदी उस पात्र को ले आईं। श्रीकृष्ण ने बर्तन को अपने हाथ में लिया और हाथ लगाकर देखने लगे। इस में उन्हें चावल का एक दाना मिल गया जिसे उन्होंने खाते हुए कहा कि अब उनकी भूख मिट गई। इधर श्रीकृष्ण ने चावल का एक दाना खाया और उधर ऋषि दुर्वासाके साथ सभी शिष्यों को ऐसा अनुभव हुआ जैसे कि उनका पेट भर गया हो।

श्रीकृष्ण ने चावल का दान खाने के बाद सहदेव को नदी किनारे जाकर दुर्वासा ऋषि को बुला लाने को कहा। सहदेव जब वहां पहुंचे तो देखा कि नदी किनारे दुर्वासा और उनके सभी शिष्य आराम कर रहे थे। पांडु पुत्र ने उन्हें भोजन के लिए चलने को कहा लेकिन दुर्वासाके साथ सभी ने यह कहकर मना कर दिया कि उन्हें ऐसा अनुभव हो रहा है कि जैसे कि उनका पेट गले तक भर गया हो।

इसके बाद सभी ऋषि के साथ वहां से चले गये। सहदेव ने वापस आकर पूरी बात बताई। यह सुन द्रौपदी और पांडवों को अनुमान हो गया कि श्रीकृष्ण ने अपने चमत्कार से एक बार फिर उनकी लाज रख ली।

अंतिम बात :

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