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मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

एक नास्तिक की कहानी | Existence of God

एक नास्तिक की कहानी | Existence of God

किसीने पूछा कि भगवान हैं? तो मेरा जवाब है जैसे जीवन है, मरण है, सूर्य है, चंद्रमा है, वैसे ही भगवान भी हैं। एक नास्तिक को आस्तिक होने में एक क्षण ही लगता है। मैंने बहुत से लोग देखे हैं, जो यह दावा करते थे कि कोई भगवान नहीं होता, और ऐसे लोग ही जब भक्ति मार्ग पर चलते हैं तो हर वक्त भगवन महिमा गाते रहते हैं। दोस्तों इसी बाँट को समझने के लिए एक छोटीसी कहानी से प्रेरणा लेंगे

Existence of God



दोस्तों ये कहानी हे एक नास्तिक व्यक्ति की जो मेडिकल दुकान का मालिक था | भगवान के नाम से ही वह चिढ़ने लगता था। घरवाले उसे बहुत समझाते पर वह उनकी एक न सुनता था | लेकिन अपना काम बहुत ही निष्ठा से करता था और अनुभव के कारन उसे अच्छी तरह पता था कि कौन सी दवाई कहाँ रखी है | वह हर ग्राहक को दवाई सावधानी से देता था

खाली वक्त मिलने पर वह अपने दोस्तों के साथ मिलकर घर या दुकान में ताश खेलता था। एक दिन की बात हे जब बहोत बारिश हो रही थी तव वह दुकान में अपने दोस्तों के साथ ताश खेल रहा था

तभी एक छोटा लड़का उसके दूकान में दवाई का पर्चा लेकर आया। उसका पूरा शरीर भीगा था। उस लड़के ने दवाई का पर्चा बढ़ाते हुए कहा- बाबूजी मुझे ये दवाइयाँ चाहिए, मेरी माँ बहुत बीमार है, उनको बचा लीजिए | इस बीच लाइट भी चली गई

उस लड़के की पुकार सुनकर ताश खेलते-खेलते ही वह व्यक्ति ने दवाई के उस पर्चे को हाथ में लिया और दवाई लेने को उठा, ताश के खेल मसगुल होने के कारण उस व्यक्ति ने अपने अनुभव से अंधेरे में ही दवाई की शीशी उस लड़के को दे दी | लड़का खुशी-खुशी दवाई की शीशी लेकर चला गया।

थोड़ी देर बाद लाइट आ गई | अब उसे मालूम पड़ा की उसने जो लड़के को दवाई दी थी वह चूहे मारने वाली जहरीली दवा थी

अब उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसकी दस साल की नेकी पर मानो जैसे ग्रहण लग गया। उस लड़के के बारे में वह सोच कर तड़पने लगा। सोचा यदि यह दवाई उसने अपनी बीमार माँ को देगा, तो वह अवश्य मर जाएगी।

एक पल वह अपनी इस भूल को कोसने लगा और ताश खेलने की अपनी आदत को छोड़ने का निश्चय कर लिया पर वह अपनी भूल पर इतना परेशान था की अब क्या किया जाए ? उस लड़के का कोई पता ठिकाना भी तो वह नहीं था की वह कहा से आया था दुविधा और बेचैनी उसे घेरे हुए थी उसकी आंखे भी भर आयी थी । घबराहट में वह इधर-उधर देखने लगा।

पहली बार उसकी दृष्टि दीवार के एक कोने में पड़ी, जहाँ उसके पिता ने जिद्द करके भगवान श्रीकृष्ण की तस्वीर दुकान के उदघाटन के वक्त लगाई थी, और उनके पिताजी ने कहा था कि भगवान की भक्ति में बड़ी शक्ति होती है, वह हर जगह व्याप्त है और हमें सदैव अच्छे कार्य करने की प्रेरणा देता है। उस व्यक्ति को उनके पिता की सारी बात याद आने लगी।

उस व्यक्ति ने पहली बार दुकान के कोने में रखी उस धूल भरे कृष्ण की तस्वीर को देखा और आंखें बंद कर दोनों हाथों को जोड़कर वहीं खड़ा हो गया। और कहा प्रभु मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गयी हे उसकी आँखों से अश्रु भी बह रहे थे की, थोड़ी देर बाद वह छोटा लड़का फिर दुकान में आया। उस व्यक्ति के पसीने छूटने लगे। वह व्यक्ति कुछ बोल भी नहीं पाया

की वह लड़का बोला बाबूजी...मेरी माँ को बचाने के लिए मैं दवाई की शीशी लिए भागे जा रहा था की पानी में मेरा पांव फिसल गया और , दवाई की शीशी गिर कर टूट गई। क्या आप मुझे वही दवाई की दूसरी शीशी दे सकते हैं?

अब उस व्यक्ति ने साँस लेते हुए कहा। लो, यह दवाई! | उस लड़के ने दवाई की शीशी लेते हुए कहा, पर मेरे पास तो अभी पैसे भी नहीं है क्या बाद में दे सकता हु ?।उस व्यक्ति ने कहा कोई बात नहीं- तुम यह दवाई ले जाओ और अपनी माँ को बचा लो । जाओ जल्दी करो, और हाँ अब की बार ज़रा संभल के जाना।

अब वह व्यक्ति भगवान को धन्यवाद देता हुआ अपने हाथों से उस धूल भरे तस्वीर को लेकर अपनी धोती से पोंछने लगा और अपने सीने से लगा लिया।



भगवान हैं। और वे विश्वास में बसते हैं। विश्वास कोई डोर नहीं, एक नास्तिक को आस्तिक बनने पर 
कोई ज़ोर नहीं।

मानो तो भगवान है, न मानो तो पत्थर,

है इंसानों के बीच का यही एक मुख्य अंतर,

आस्था विश्वास है, न मानो तो एक एहसास,

मिल जाते हैं ईश्वर हर किसी को, जो रखते हैं उन्हें अपने दिल में,

न मानो तो भी वे वहीं मिलेंगे,

क्योंकि उनका अस्तित्व है हर नींव में,

फर्याद करोगे तो भी वे सुनेंगे,

क्योंकि यह विश्वास है कुछ ऐसा,

जहाँ इसी संसार में मिलता है जैसे को तैसा।

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