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Thursday, March 7, 2019

जैसा कर्म वैसा फल! | कर्मफल का सिद्धान्त

कर्मफल का सिद्धान्त - जैसा कर्म करोगे वैसा ही फल मिलेगा

नमस्कार दोस्तों यह कहानी सिद्धांत के बारेमे हे कर्म का सिद्धांत यह हे की हम जैसे कर्म करते है, हमें उसका वैसा ही फल मिलता है। हमारे द्वारा किये गए कर्म ही हमारे पाप और पुण्य तय करते है। हम अच्छे कर्म करते है तो हमें उसके अच्छे फल मिलते है और अगर हम बुरे कर्म करते है तो हमें उसके बुरे फल मिलते है।

ये सच है कि हम जैसे कर्म करते है, हमें उसका वैसा ही फल मिलता है। हमारे द्वारा किये गए कर्म ही हमारे पाप और पुण्य तय करते है। हम अच्छे कर्म करते है तो हमें उसके अच्छे फल मिलते है और अगर हम बुरे कर्म करते है तो हमें उसके बुरे फल मिलते है।

दोस्तों हमारे जीवन में जो भी परेशानियां आती हैं, उनका संबंध कहीं ना कहीं हमारे कर्मों से होता है।

कभी कभी हम जान बूझकर गलत काम करते हैं तो कभी अनजाने में गलत काम कर जाते हैं। जिसके कारण हमें आगे चलकर परेशानी उठानी पड़ती हैं। इस बात को समझने के लिए एक छोटीसी कहानी से प्रेरणा लेंगे

कर्मफल का सिद्धान्त

एक राजा था जिसने अपने कुछ दरबारियों की परीक्षा लेने की सोची | और एक दिन राजा ने तीन दरबारियों को अपने महल में बुलाया और तीनो को एक एक थैला दिया और कहा की इसे लेकर जायें और वाटिका से अच्छे अच्छे फल तोड़ कर लायें। तीनो दरबारियों ने राजा की बात स्वीकार की और थैला लेकर वाटिका में चले गए।

पेहले दरबारी ने वाटिका में जाकर सोचा कि राजा के लिए अच्छे अच्छे फल तोड़ कर ले जाता हूँ ताकि राजा को पसंद आये। और उसने चुन चुन कर अच्छे अच्छे फलों को अपने थैले में भर दिया

दूसरे दरबारी ने वाटिका में जाकर सोचा कि राजा को कौन से फल खाने है?” वो तो फलों को देखेंगे भी नहीं। ऐसा सोचकर उसने अच्छे बुरे जो भी फल मिले उससे अपना थैला भर दिया ।

तीसरे दरबारी ने वाटिका मेंजाकर सोचा कि समय क्यों बर्बाद किया जाये, राजा तो मेरा भरा हुआ थैला ही देखेगे। अंदर क्या हे ये नहीं देखेंगे ऐसा सोचकर उसने घास फूस से अपने थैले को भर लिया।

अब तीनो दरबारी अपना अपना थैला लेकर राज महल में पोहचे । राजा ने ठेलो को देखे बिना ही उन तीनो दरबारियों को एक महीने के लिए जेल में बंद करने का आदेश दिया और कहा कि इन्हे खाने के लिए कुछ नहीं दिया जाये। ये अपने फल खाकर ही अपना गुजारा करेंगे।

अब जेल में तीनो दरबारीयों के पास अपने अपने थैलो के अलावा और कुछ नहीं था। जिस दरबारी ने अच्छे अच्छे फल चुने थे, वो बड़े आराम से फल खाता रहा और उसने बड़ी आसानी से एक महीना फलों के सहारे गुजार दिया।

जिस दरबारी ने अच्छे बुरे दोनों प्रकार के फल चुने थे वो कुछ दिन तो आराम से अच्छे फल खाता रहा लेकिन उसके बाद सड़े गले फल खाने की वजह से वो बीमार हो गया। उसे बहुत परेशानी उठानी पड़ी और बड़ी मुश्किल से उसका एक महीना गुजरा।

लेकिन जिस दरबारी ने घास फूस से अपना थैला भरा था वो कुछ ही दिनों में भूख से मर गया। राजा ने तीनो दरबारियों को एक जैसा कर्म दिया था और तीनो को प्रयाप्त समय भी दिया था लेकिन अंत में जिसने जैसा कर्म किया उनको वैसा ही फल मिला

तो दोस्तों हमारा जीवन भी इस ठेले की तरह हे और हमे ये देखना हे की हम अपने जीवन में कौन कौन से फल इकठ्ठे कर रहे हे यानि की अगर हम अच्छे कर्म करते हे तो हम ख़ुशी से अपनी जिंदगी गुजार सकेंगे और अगर हम बुरे कर्म कर रहे हे तो हमे बुरे ही फल मिलेंगे इसलिए हमेशा अच्छे कर्म करें और दूसरों को भी अच्छे काम करने के लिए प्रेरित करें।

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