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Sunday, August 5, 2018

Brahma Vishnu Mahesh | ब्रह्मा विष्णु महेश

जब से सृष्टि का आरंभ हुआ तबसे कई बार यह सवाल उठा की ब्रह्मा, विष्णु और महेश में से बड़ा कौन है. हमारे पुराणोंमें इसके विषय में कई कथा मिलती है. ब्रह्मा विष्णु महेश तीनो एक ही हे और तीनो अहंकार से रहित हे इसीलिए उनमे न कोई बड़ा हे न कोई छोटा हे | 
Brahma Vishnu Mahesh
गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि रुद्रोमें में शंकर हु. इसका मतलब यह भी होता है की जो रूद्र है वह कृष्ण है और जो कृष्ण है वहीँ रूद्र है.गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि जो भक्त मुझे जिस तरह भजता है में उसे वैसे ही रूप में प्राप्त होता हूँ. इसका मतलब यह होता है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश वास्तव में एक ही परम तत्व है. जब यह तीनो एक ही परम तत्व है तो यह तुलना करना संभव ही नहीं है कि कौन बड़ा है.
ब्रह्मा विष्णु महेश की लीला को रामानंद सागर ने हमे 2000 की साल में टेलीविज़न के जरिये दिखाया था | हमे रामानंद सागर का दिल से धन्यवाद करना चाहिए जिन्होंने हमे धर्म के बारे में बताया 

ब्रह्मा विष्णु महेश के प्रथम चरण में सती अनुसुइया की कहानी हे | 

अनुसूईया से दतात्रोय रूप में भगवान विष्णु का , चन्द्रमा के रूप में ब्रह्मा का तथा दुर्वासा के रूप में भगवान शिव का जन्म हुआ।

दूसरे चरण में सृष्टि की रचना एवं जय और विजय के बारेमें हे

ब्रह्मा जी के चार मानसपुत्र (ब्रह्मा जी के मस्तिष्क से उत्पन्न पुत्र) एक बार भगवान् विष्णु के दर्शन करने बैकुंठ लोक गए। कुमारों ने अतिवृद्ध होने के उपरान्त भी अपनी योग साधना के बल पर बालकों का रूप धारण कर लिया। जब कुमार बैकुंठ के द्वार पर पहुँचे, तब वहाँ के द्वारपालों, जय और विजय ने उन्हें बालक समझ यह कहकर अंदर प्रवेश करने से रोक दिया कि अभी भगवान् विष्णु विश्राम कर रहे हैं, अतः वे इस समय उनसे नहीं मिल सकते। उनकी इस बात से क्रोधित हो कुमार बोले कि भगवान् विष्णु तो अपने भक्तों के लिए सदैव उपलब्ध रहते हैं। इसी के साथ कुमारों ने जय-विजय को शाप दे दिया कि उन्हें अपनी दिव्यता का त्याग कर, मनुष्य रूप में धरती पर जन्म लेना होगा और सामान्य जीवों की भांति जीवनयापन करना होगा।

उसी समय भगवान् विष्णु वहाँ प्रकट हुए, उन्हें देखकर जय-विजय ने उनसे शाप से मुक्त करने की प्रार्थना की। किन्तु एक बार दिया हुआ शाप वापस नहीं लिया जा सकता, अतः भगवान् विष्णु ने उनके समक्ष दो विकल्प रखे – पहला यह कि उन्हें भगवान् विष्णु के भक्तों के रूप में धरती पर सात जन्म लेने होंगे और दूसरा यह कि उन्हें भगवान् विष्णु के शत्रुओं के रूप में धरती पर तीन जन्म लेने होंगे। इनमें से किसी भी एक विकल्प को पूर्ण करने पर वो दोनों पुनः बैकुंठ लोक के द्वारपाल बन जाएंगे। जय और विजय ने दूसरा विकल्प चुना ताकि उन्हें सात जन्मों तक भगवान् विष्णु का वियोग न सहना पड़े।

इसी कारणवश, जय और विजय अपने पहले जन्म में हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के रूप में जन्मे और क्रमशः भगवान् विष्णु के नरसिंह और वराह अवतार द्वारा मारे गए। दूसरे जन्म में दोनों रावण और कुम्भकर्ण के रूप में जन्मे और राम अवतार के हाथों मारे गए। तीसरे जन्म में वो दोनों शिशुपाल और दंतवक्र के रूप में जन्मे और भगवान् विष्णु के ही कृष्ण अवतार के हाथों मारे गए और अंततः उन्हें शाप से मुक्ति मिल गई।

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